आज एक ऐसे क्रांतिकारी की जन्म जयंती है, जिनकी भारत के स्वतंत्रता संग्राम में एक विशिष्ट भूमिका थी।
1870 के आसपास पुणे में एक क्रांतिकारी ने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ आवाज उठाई और ये थे- वासुदेव बलवंत फड़के। उनका जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में 4 नवंबर1845 को हुआ। पंद्रह वर्ष की उम्र में उनको सरकारी नौकरी मिल गई। एक बार माँ की बीमारी की चिट्ठी मिलते ही अंग्रेज अफसर से छुट्टी माँगने गए तो उसने हिंदुस्तानी होने के नाते उनको खूब खरी-खोटी सुनाई और छुट्टी देने में पहले तो देर की और फिर मना कर दिया। वे फिर भी गाँव चले गए। जाने में विलम्ब हो चुका था। घर पहुँचकर देखा तो माँ उनका मुंह देखे बिना ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं। इस घटना ने उनको अंदर तक हिला दिया और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ मजबूती से खड़ा कर दिया। उन्होंने आदिवासियों को इकट्ठा कर ‘रोमोशी’ नाम का सशस्त्र दल बनाया।
कहा जाता है कि उस दौरान महाराष्ट्र के सात जिलों में इस रोमोशी सशस्त्र दल की अंग्रेजों के मन में पूरी दहशत थी। अंग्रेज अफसर डर गए थे। इस कारण अंग्रेज सरकार ने उन्हें जिन्दा या मुर्दा पकड़ने पर पचास हजार रुपए का इनाम घोषित किया।
एक दिन अंग्रेजों ने इनको गिरफ्तार कर भारत के बाहर की जेल में भेज दिया। कहा जाता है, वहाँ इन्होंने भूख हड़ताल कर दी। फिर उनकी मृत्यु हो गई। पुणे रेलवे स्टेशन के पास इनका स्मारक बना हुआ है। अपनी जून 2016 की पुणे यात्रा में मुझे उनके स्मारक पर नमन करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार से वासुदेव बलवंत फड़के ने स्वतंत्रता के आंदोलन में अपना यादगार सहयोग दिया, बलवंत फड़के महाराष्ट्र के क्रांतिकारियों के लिए हमेशा के लिए एक आदर्श बन गए।
साभार
देशभक्ति के पावन तीर्थ
लेखक ऋषि राज
प्रभात प्रकाशन