शहीद कैप्टेन अमित भारद्वाज का बलिदान दिवस!

आज समय है कारगिल युद्व के एक शहीद कैप्टेन अमित भारद्वाज को नमन करने का आज उनका बलिदान दिवस है।

वर्ष 2020 में जयपुर में मुझे शहीद कैप्टन अमित भारद्वाज के माता पिता के चरण स्पर्श करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कैप्टेन अमित के पिता श्री ओ पी शर्मा जी रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया से डी जी एम के पद से सेवा निवृत्त हो चुके हैं। जब अमित जी के जीवन से जुड़ी बातें बताने लगे तो उनकी आंखों में गर्व की अनुभूति दिखाई पड़ी। उनके पुत्र ने जो देश के लिए किया है उसका कर्ज़ हम कभी उतार नही सकते। वीर माता श्रीमती सुशीला शर्मा ने भी अमित जी के जीवन से जुड़ी कुछ बातें सांझा की।

वर्ष 2020 में जयपुर में मुझे शहीद कैप्टन अमित भारद्वाज के माता पिता के चरण स्पर्श करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कैप्टेन अमित के पिता श्री ओ पी शर्मा जी रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया से डी जी एम के पद से सेवा निवृत्त हो चुके हैं। जब अमित जी के जीवन से जुड़ी बातें बताने लगे तो उनकी आंखों में गर्व की अनुभूति दिखाई पड़ी। उनके पुत्र ने जो देश के लिए किया है उसका कर्ज़ हम कभी उतार नही सकते। वीर माता श्रीमती सुशीला शर्मा ने भी अमित जी के जीवन से जुड़ी कुछ बातें सांझा की।

कारगिल से थोड़ा पहले एक स्थान पड़ता है, काकसर। मई 1999 में काकसर की बजरंग पोस्ट से जब 4 जाट रेजीमेन्ट के लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथी वापिस नहीं लौटे, तो कैप्टन अमित भारद्वाज ने उन्हें ढूंढने जाने की इच्छा जाहिर की।

कारगिल से थोड़ा पहले एक स्थान पड़ता है, काकसर। मई 1999 में काकसर की बजरंग पोस्ट से जब 4 जाट रेजीमेन्ट के लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया और उनके साथी वापिस नहीं लौटे, तो कैप्टन अमित भारद्वाज ने उन्हें ढूंढने जाने की इच्छा जाहिर की।

17 मई 1999 को कैप्टन अमित भारद्वाज अपने 30 जवानों के साथ लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया की खोज में निकल पड़े। डेढ़ दिन तक वे बर्फीली पहाडिय़ों पर चढ़ते रहे और जैसे ही बजरंग पोस्ट के निकट पहुंचे, उन्हें कुछ अलग सी हलचल महसूस हुई, उन्होंने अपने साथ दो जवानों को लिया और आगे बढ्ने लगे तभी ऊपर से अंधाधुंध फायरिंग होने लगी और कैप्टन अमित भारद्वाज के पैरों में गोलियां लग गई। अपने अधिकारी को घायल देख उनके साथियों ने उनसे नीचे चलने का आग्रह किया पर वो दुश्मन को पीठ नहीं दिखाना चाहते थे वे दुश्मनों का डट कर मुकाबला करते रहे। जाट रेजीमेंट की उच्चतम परम्पराओं का पालन करते हुए, उनके एक हवलदार राजवीर सिंह ने उनका साथ नहीं छोड़ा, वो दोनों ही दुश्मन की गोलियों का निरंतर जवाब देते रहे, फिर अचानक से एक गोली अमित के पेट में आ कर लग गयी। दुश्मन से लोहा लेते हुए उन्होने देश के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

कैप्टन अमित भारद्वाज लेफ्टिनेंट अमित का पार्थिव शरीर करीब दो महीनों तक काकसर की पहाड़ियों पर पड़ा रहा। उनके शव को हम तभी नीचे ला पाये जब काकसर पर हमारा पुनः कब्जा स्थापित हो गया। सबसे बड़ी त्रासदी तो ये रही की कैप्टन अमित भारद्वाज के मां-बाप भारत माता के इस सपूत के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाये क्यूंकी शव गलने की वजह से उनका शव ताबूत से बाहर ही नहीं निकाला गया और अंतिम संस्कार भी ताबूत के साथ ही करना पड़ा। एक माँ बाप के लिए इससे दुखद क्या रहा होगा।

कैप्टन अमित भारद्वाज लेफ्टिनेंट अमित का पार्थिव शरीर करीब दो महीनों तक काकसर की पहाड़ियों पर पड़ा रहा। उनके शव को हम तभी नीचे ला पाये जब काकसर पर हमारा पुनः कब्जा स्थापित हो गया। सबसे बड़ी त्रासदी तो ये रही की कैप्टन अमित भारद्वाज के मां-बाप भारत माता के इस सपूत के अंतिम दर्शन भी नहीं कर पाये क्यूंकी शव गलने की वजह से उनका शव ताबूत से बाहर ही नहीं निकाला गया और अंतिम संस्कार भी ताबूत के साथ ही करना पड़ा। एक माँ बाप के लिए इससे दुखद क्या रहा होगा।

अमर शहीद कैप्टेन अमित भारद्वाज को ऋणी राष्ट्र की ओर से शत शत नमन।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *